औरंगजेब की आखरी रात ( सारांश)
औरंगजेब ( Aurangzeb) मुगल इतिहास का आखिरी हीरा है जो अपने जीवन भर अपने बुरे कर्मो से ही चमकता रहा और जब मरा तो सारी जिन्दगी का क्लेष और निराशा, विकलता और व्यथा को लेकर गया! जिन्दगी के पूरे सत्ताईस साल उसने दक्खन में बिताये और अंतिम सॉँस भी वहीं पर ली। दक्षिण सर करने की, शिवाजी और मरहठों को नेस्तनाबूद करने की, इस्लाम का झण्डा पूरे हिन्दोस्ताँ पर फहराने की वासना पूरी किये बिना ही वह चल बसा । प्रस्तुत एकांकी में उसकी इसी विकलता का चित्रण किया गया है। वह इतना कट्टर धार्मिक था कि उसने बीजापुर-गोलकुण्डा जैसी मुस्लिम रियासतों को भी जीत लिया, परन्तु वह मराठों को नामशेष करने में सफल न हुआ। एक ओर राज्य में दुर्व्यवस्था फैल गई है, दूसरी ओर वह वृद्ध हो गया है। पहले जैसी ताकत अब उसके शरीर में नहीं रही । आलमगीर बनने का उसका विजय स्वप्न अब निराशा में तिरोहित हो चला है। उसकी चिंताएँ उसे एक पल के लिए भी चैन नहीं लेने देतीं और अंत में हताश होकर वह अहमदनगर लौट आया है। ...